तेरी दिल्लगी को मुहब्बत समझता रहा
खाये पत्थर बहुत फ़िर भी हँसता रहा।
जो भी आया जज़्बातों की गर्मी दे गया
मोम का दिल था पिघलता रहा।
क्या ख़बर थी एक दिन ये हालत होगी
बैठ, किस्मत पे अपनी रोता रहा हँसता रहा।
ज़रूर किसी बादल का दिल टूटा है
सारी रात आज पानी बरसता रहा।
सारे भरम टूट गये जब नज़र फेर ली तुमने
जिनके बूते पे मुहब्बत का दम भरता रहा।
जा लौट जा झूठा था उसका वादा
उस आशिक से दरिया ये कहता रहा।
Tuesday, August 7, 2007
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